पं श्याम त्रिपाठी/बनारसी मौर्या
नवाबगंज गोंडा। महंगूपुर में स्थित भगवान कपिल के मंदिर स्थल के संबंध में कई कथाएँ प्रचलित हैं। जो चमत्कारिक अतीत की गवाह हैं।
जनश्रुति के अनुसार करीब 400 वर्ष पूर्व गाँव के निकट बहने वाली कुटिला सरयू नदी में आयी भीषण बाढ़ के बाद तट पर एक शिलापट दिखाई पड़ा। जिसे साधारण पत्थर जान एक सुअर पालक ने लें जाकर सुअर के दड़बे का दरवाजा बना लिया। लेकिन सुबह उसकी सूअरों के मृत होने पर उसने घबराकर शिला को पुनः तट पर छोड़ दिया। अब उसे एक धोबी ने कपड़ा धोने की पाटी के रूप में इस्तमाल करना शुरु किया। किन्तु रात्रि में उसे स्वप्न के माध्यम से ऐसा न करने का निर्देश प्राप्त हुआ, उसने भी उसे उसी स्थान पर छोड़ दिया। अब इस पर एक सुनार की निगाह पड़ी तो उसे उठा ले गया और उसपर आभूषण गढ़ने लगा, किन्तु वह जो भी आभूषण गढ़ता वह टूटकर रक्त रंजित हो जाता। घबराकर वह भी उसे वहीं तट पर छोड़ गया। अब तक इस प्रतिमा के असाधारण होने की बात भी क्षेत्र में फ़ैल गयी थी। फिर नगर के ही एक सेठ अधारी साव को रात्रि स्वप्न में इस प्रतिमा के भगवान कपिल से अनुप्रमाणित होने का मार्गदर्शन मिला, और इसे स्थापित करने का निर्देश भी स्वप्न से प्राप्त हुआ। उन्होंने महंगूपुर गाँव में लोगों के सहयोग से एक छोटे मंदिर का अस्थायी निर्माण कराकर प्रतिमा स्थापित करवा दी। तबसे पूजा पाठ आदि चलने लगा।
गाँव के लोग बताते हैं कि जब मंदिर अस्थाई था तब एक बार मंदिर की साफ सफाई के लिए प्रतिमा को हटाने के लिए एक व्यक्ति ने अहंकार में कहा कि इस शिला को अकेले हटाकर अलग रख दूंगा। फिर कई कोशिशो के बाद भी कोई प्रतिमा को हिला नहीं सका। फिर काफी अनुनय विनय के बाद ही प्रतिमा को स्थानांत्रित किया जा सका। एक बार तत्कालीन पुजारी जमुनादास ने प्रतिमा में आँख लगाने हेतु उसे औजार से खंडित करना चाहा तो उनके आँखों की ज्योति चली गयी। अपराध बोध और मिन्नतो के बाद ज्योति वापस आ सकी। इस प्रकार कपिल मुनि मंदिर का पौराणिक महत्व है। वर्तमान में मंदिर का जीर्णोद्धार हो चुका है। तथा मंदिरपर पूजा पाठ के लिए पुजारी भी नियुक्त हैं। धर्म ग्रंथो के अनुसार भगवान कपिल कर्दम देवहुति के दसवी संतान के रूप में उत्पन्न हुए। उन्होंने सांख्य शास्त्र की शिक्षा दी। गंगासागर (कोलकाता) में भी इनका पौराणिक मंदिर विद्यमान है। गोंडा जनपद में सरयू का तट ऋषियों की तपोस्थली के रूप में जाना जाता है। कुटिला सरयू संगम तट पर भगवान कपिल के आश्रम के प्रमाण शिवपुराण में मिलते हैं।


